lucknow k nawab ki shayyiri
urdu ghazals, shayari.
Friday, June 5, 2009
ghalib ki shayyiri
कोई दिन गर जिंदगानी और है
अपने जी में हमने ठानी और है
बारहा देखी हैं इनकी रंजिशें
पर कुछ अब के सर_गिरानी और है
देके ख़त मुँह देखता है नामबर
कुछ तो पैगाम-ए-ज़ुबानी और है
हो चुकीं "ग़ालिब" बलायें सब तमाम
एक मर्ग-ए-नागहानी और है
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