Friday, May 29, 2009

faiz ahmed faiz ki shayyiri

नसीब आजमाने के दिन रहे हैं
करीब उनंके आने के दिन रहे हैं
जो दिल से कहा है जो दिल से सुना है
सब उनको सुनाने के दिन रहे हैं
अभी से दिल--जान सर--राह रख दो
के लुटने लुटाने के दिन रहे हैं
टपकने लगी उन् निगाहों से मस्ती
निगाहें चुराने के दिन रहे हैं
सबा फिर हमें पूछती फिर रही है
चमन को सजाने के दिन रहे हैं
चलो 'फैज़' फिर से कहीं दिल लगाये
सुना है ठिकाने के दिन रहे हैं

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