ये जमाल क्या, ये जलाल क्या, ये आरूज क्या, ये ज़वाल क्या
वो जो पेड़ जड़ से उखड़ गया उससे मौसोमों का मलाल क्या
वोह जो लम्हा लम्हा बिखर गये, वोह अपनी हद से गुज़र गया
उससे फिक्र शाम-ओ-सेहर क्या, उसे रंजिश मह-ओ-साल क्या
हुआ रेजा रेजा जो दिल तेरा इसे जोड़ जोड़ के मत दिखा
वोह जो अपने हुस्न में मस्त है उससे आईने का ख्याल क्या
वोही हिज्र रात की बात है वोही चाँद तारों का साथ है
जो फरक से हो आशना उससे आरजू-ए-वसल क्या
किसी और से करे क्यूँ गिला, माहें अपने आप से दुःख मिला
वोह जो दर्द-ए-दिल हो आशना उससे दुनिया भर का वबाल क्या
वोही गर्द गर्द गुबार है वोही चारों और फ़शार है
वोह जो ख़ुद ओ भी नही जनता वोह हो मेरा वाकिफ-ए-हाल क्या
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