हिसाब-ए-उमर का इतना सा गोशवारा है
तुम्हें निकल के देखा तो सब खसारा है
वोह किया विसाल का लम्हा था जिस के नशे में
तमाम उमर के फुर्क़त हमें गवारा है
अजब असूल हैं इस कारोबार-ए-दुनिया के
किसे का क़र्ज़ किसे और ने उतरा है
यह दो किनारे तो दरिया के हो गए हम तुम
मगर वोः कौन है जो तीसरा किनारा है
Subscribe to:
Post Comments (Atom)


No comments:
Post a Comment