हम अभी और भी कुछ रोज़ परेशां होंगे
उक़्द-ए-मुश्किल[difficult knot] हैं तोह मुश्किल से ही आसन होंगे
तख्त अपना है मगर वक्त नहीं है अपना
वक्त आया तोह हमीं लोग सुलेमान होंगे
हब्स[confinement] इस शहर में ऐसा है के दम घुटता है
कब बहार आएगी कब चाक गरीबां होंगे
आज उस बज्म-ऐ-तरब में हमें ले चल ऐ दिल
आज हमदर्द के मारे भी ग़ज़ल-ख्वान होंगे
ये जो हैं शहर के वाइज़, ये खातिबान-ऐ-किराम[exalted orators]
ये भी अल्लाह ने चाह तोह मुसलमान होंगे
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Friday, May 29, 2009
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