इस से पहले के ज़माने को ख़बर हो जाए
खुदा करे के शब्-ए-ग़म की सहर हो जाए
खुला रहेगा यह दरवाज़ा तेरे आने तक
लौट कर आना कहीं शाम अगर हो जाए
अबस है आरजू करना भी रौशनी की यहाँ
दिया जले तो हवाओं की नज़र हो जाए
जब भी आती है तेरी याद लिए आती है
रात तन्हा कभी आए तो बसर हो जाए
तू कभी चश्म-ए-तसवुर से उन्हे देख ज़रा
मंजिलों पे जिन्हें दरपेश सफर हो जाए
कूचा-ए-दिल से चले 'खान' तो हालत यह थी
जैसे दीवाना कोई शहर बदर हो जाए
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Saturday, June 6, 2009
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