lucknow k nawab ki shayyiri
urdu ghazals, shayari.
Friday, June 5, 2009
unknown
भूल हो जाती है यूँ तेश में आया न करो
फासले ख़तम करो बात बढाया न करो
ये निगाहें, ये इशारे, ये अदाएं, तौबा !
इन शरबतों को सर-ए-आम लुटाया न करो
शाम गहरी हो तो कुछ और हसीन होती है
साया-ए-जुल्फ को चेहरे से हटाया न करो
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