अपनी आँखों के समंदर में उतर जाने दे
तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे
ऐ नए दोस्त मैं समझूंगा तुझे भी अपना
पहले माजी का कोई ज़ख्म तो भर जाने दे
आग दुनिया की लगायी हुई बुझ जायेगी
कोई आंसू मेरे दमन पे बिखर जाने दे
ज़ख्म कितने किसी की चाहत से मिले हैं मुझको
सोचता हूँ की कहों तुझसे .... मगर जाने दे !!!!
No comments:
Post a Comment