कभी जो एहद-ए-वफ़ा मेरी जान तेरे मेरे दरमियाँ टूटे
मैं चाहता हूँ के इससे पहले ज़मीन पे ये आसमान टूटे
तेरी जुदाई में होंसलों की शिकस्त दिल पर आजाब ठहरी
के जैसे मौन-जूर ज़लज़लों की धमक से कोई चटान टूटे
उससे यकीन था, उसको मरना है, फिर भी ख्वाइश थी उसके दिल में
कि तीर चलने से पेश्तर दस्त-ए-दुश्मन में कमान टूटे
वो संग है तो गिरे भी दिल पर, वो आईना है तो चुभ ही जाए
कहीं तो मेरा यकीन बिखरे, कहीं तो मेरा गुमान टूटे
उजाड़ बन की उदास रूत में ग़ज़ल तो 'मोहसिन' ने छेड़ दी है
किसे ख़बर है कि किस के मासूम दिल पर अब के ये तान टूटे
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