न दोस्तों से न गैरों की दुश्मनी से था
मेरा मुकाबिला बस अपनी जात ही से था
किसी भी मोड़ पे रुकना कब गवारा था मुझे
मेरी अना का ताल्लुक फ़क़त मुझी से था
तमाम उमर मैं ढूंढता रहा रफाकात को
मैं शर्मसार बहुत उसकी दोस्ती से था
दिल-ओ-निगाह भी आमादा-ऐ-सुजूद[in prostation] रहे
मेरी जबीं का ताल्लुक भी बंदगी से था
थे बद-गुमां सभी मेरी जात-ऐ-वाहिद से
मगर सुकून भी उस शहर में मुझी से था
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