lucknow k nawab ki shayyiri
urdu ghazals, shayari.
Wednesday, April 15, 2009
मंजिल भी उसकी थी ,रास्ता भी उसका था .
एक मैं अकेला था काफिला भी उसका था ,
राह मे साथ चलने की मर्जी भी उसकी थी ,
फिर राह मे साथ छोड़ने का फैसला भी उसका था ,
आज मैं अकेला हू तो दिल सवाल करता है ,
लोग तो सब उसके थे क्या खुदा भी उसका था .....
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