Monday, November 24, 2008

unknown

आग है,पानी है मिट्टी है,हवा है मुझमें
और फ़िर मानना पड़ता है खु़दा है मुझमें
जितने मौसम हैं सब जैसे कहीं मिल जाएं
इन दिनों कैसे बताऊं जो फ़ज़ां है मुझमें
टोक देता है क़दम जब भी ग़लत उठता है
ऐसा लगता है कोई मुझसे बडा़ है मुझमें
आईना ये तो बताता है मैं क्या हूं लेकिन
आईना इस पे है खा़मोश कि क्या है मुझमें
अब तो बस जान ही देने की है बारी से नूर
मै कहां तक करूं साबित कि वफ़ा है मुझमें

No comments:

Post a Comment