Monday, June 1, 2009

shamim ki shayyiri

हज़ार अहल-ए-जूनून हल्का-ए-रसन में रहे
मगर ख्याल-ए-परस्तारी-ए-चमन में रहे
तेरे ख्याल के एहसान रहेंगे याद हमें
जिस अंजुमन में रहे तेरी अंजुमन में रहे
गया न क़ैद-ए-क़फ़स में भी बांकपन अपना
उसी तरह से रहे जिस तरह चमन में रहे
वो खार जिनसे गुज़रते हैं लोग बच बच कर
बहार बन के वो ही मेरे पैरहन में रहे
तमाम रात गुजारी ख्याल-ए-खुबान में
तमाम रात सितारों की अंजुमन में रहे
कुछ इस तरह से रहो रुह-ए-गुलिस्तान बन कर
तुम्हारे बाद तुम्हारी महक चमन में रहे
वो इख्तिलाफ न हो मैकशों में ऐ साकी
नई शराब अगर साग़र-ए-कुहन में रहे
दर-ए-जिगर भी मिला आस्ताना-ए-तस्कीन भी
'शमीम' क्यूँ न सरफ़राज़ अहल-ए-सुखन में रहे

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