नमुरादी का ये आलम भी तो ऐ दिल न रहे
अब तो हम तर्क-ए-ताल्लुक के भी काबिल न रहे
आज उसने शरफ-ए-हमसफरी बख्शा था
इस तरह से के मुझे खाहिश-ए-मंजिल न रहे
सामने तू हो तो सो ख्वाहिशें जाग उठती हैं
काश अब के मेरी आंखों में मेरा दिल न रहे
और होंगे के जो आईना सिफत जीते हैं
मैं तो मर जाऊं अगर कोई मुकाबिल न रहे
जो भी हो साहेब-ए-महफिल यही कहता है 'फ़रज़'
वो जो उठ जाए तो महफिल से तो महफिल न रहे
Tuesday, June 2, 2009
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