आँख प्यासी है कोई मंज़र दे
इस जजीरे को भी समंदर दे
अपना चेहरा तलाश करना है
गर नही आईना तोह पत्थर दे
बंद कलियों को चाहिए शबनम
इन् चिरागों में रौशनी भर दे
पत्थरों के सरों से क़र्ज़ उतार
इस सदी को कोई पयम्बर दे
कह-कहों में गुज़र रही है हयात
अब किसी दिन उदास भी कर दे
Friday, May 29, 2009
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