तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे
मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे
तुम्हारे बस में अगर हो तोह भूल जाओ हमें
तुम्हें भूलने में शायद मुझे ज़माना लगे
हमारे प्यार से जलने लगी है ये दुनिया
दुआ करो किसी दुश्मन की बद_दुआ न लगे
न जाने क्या है उस्सकी बेबाक आंखों में
वो मुँह छुपा के जाए भी तोह बेवफा न लगे
जो डूबना है तोह इतने सुकून से डुबो
के आस-पास की लहरों को भी पता न लगे
हो जिस अदा से मेरे साथ बेवाफ्फई कर
के तेरे बाद मुझे कोई बेवफा न लगे
वो फूल जो मेरे दामन से हो गए मंसूब
खुदा करे उन्हे बाज़ार की हवा न लगे
तुम आँख मूँद के पी जाओ ज़िन्दगी 'कैसर'
के एक घूँट में शायद ये बद-मज़ा न लगे
Friday, May 29, 2009
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