तेरे दर से उठ कर जिधर जाऊं मैं
चलूँ दो क़दम और ठहर जाऊं मैं
अगर तू ख़फा तोह परवाह नहीं
तेरा ग़म ख़फा हो तोह मर जाऊं मैं
तबस्सुम ने इतना डशा है मुझे
कली मुस्कुराये तोह डर जाऊं मैं
संभाले तोह हूँ ख़ुद को तुझ बिन मगर
जो छू ले कोई तोह बिखर जाऊं मैं
Friday, May 29, 2009
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