मेरी आखों के तसब्बुर में है सूरत तेरी
ये मोहोब्बत है इनायत है अकीदत तेरी
तू ने हर शख्स को दीबना बना रख्खा है
दोरे काबा में भी होती जरुरत तेरी
तेरी निसबत ने मिलाया है मुझे मालिक से
ये हकीकत है हकीकत है हकीकत तेरी
मैने जिस दिन तसब्बुर में तुझे देखा है
ज़र्रे ज़र्रे में नज़र आती है सूरत तेरी
राही तो कुछ भी नहीं कुछ भी नहीं कुछ भी नहीं
माँ की खिदमत से मिली है राही को निसबत तेरी
गोसे आज़म की शान में ( ज़ुबीन राही )
Monday, April 13, 2009
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