Monday, April 13, 2009

buniyad hussain ''zaheen'' bikaneri ki shayyiri

नस्ले-आदम में सादगी भर दे
अब तो इन्सां में आजिज़ी भर दे
बिस्तरे -मर्ग पे जो लेटे हैं
उनकी साँसों में ज़िन्दगी भर दे
हम ग़रीबों के आशियानों में
मेरे मालिक तू रोशनी भर दे
भीगी - भीगी रहें मेरी पलकें
इनमें एहसास की नमी भर दे
फ़स्ले-गुल और मैं तही-दामन
मेरे दामन में भी ख़ुशी भर दे
अब तो सारा चमन शबाब पे है
पत्ते - पत्ते में सरखुशी भर दे
तेरे नगमे हों क्यूँ उदास ''ज़हीन''
इनकी रग - रग में शाइरी भर दे

Ref : असरे-क़लम

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