Monday, April 13, 2009

buniyad hussain ''zaheen'' bikaneri ki shayyiri

ज़मीन पर हैं क़दम ख्वाब आसमान के हैं
शिकस्ता पर हैं मगर होसले उड़ान के हैं
लबे -जहाँ पे कसीदे हमारी शान के हैं
तुझे खबर है कि हम कैसी आन -बान के हैं
तकान रोक न पायेगी रास्ता मेरा
ये मेरे होसले मोहताज कब तकान के हैं
फिसल न जाएँ कहीं पाँव फिर बुलंदी से
ज़रा संभल के चलो रास्ते ढलान के हैं
तेरी भवों कि तनावट को जानता हूँ मैं
ये तीर जितने हैं सारे तेरी कमान के हैं
ज़माने भर को बताने कि क्या ज़रुरत है
''ये मसअले तो तेरे -मेरे दरमियान के हैं
ये दौरे -शाम -ओ -सहर अस्ले-ज़िन्दगी कब है
ज़मीन वालो ये चक्कर तो आसमान के हैं
ज़बान वो जिसे कहते हैं आज सब उर्दू
''ज़हीन'' हम भी तो शैदा उसी ज़बान के हैं

Ref : असरे-क़लम

No comments:

Post a Comment