मंजिल का रास्ता था......... सो अब भूलता नही...
वोह शख्स आशना था ........सो अब भूलता नही...
कहने को तो कुछ दिन ही गुज़रे थे उस के साथ..
सदियों का वास्ता था...........सो अब भूलता नही...
चंद पल रफ़ाक़तों के बीते थे उस के संग.....
पूरलुत्फ़, दिलरुबा था.........सो अब भूलता नही...
माणूस अजनबी था ,यान दिल का वोह चोर था.....
जो भी था बेस भला था.....सो अब भूलता नही...
बातों मैं सात रंग थे,लहजे मैं था वकार..
हमदम था, हमनवा था......सो अब भूलता नही...
काली, तरीक रातों का रोशान चिराग था.....
मुंडेर का दीया था........सो अब भूलता नही....
कुछ रंग अपने संग वोह लाया था गैर कर....
कुछ हम को दे गया था....सो अब भूलता नही...
कुछ दिन खुशी के हम को उसी से हुई नसीब....
कुछ दिन मेरा रहा था....सो अब भूलता नही....
था यूँ तो अजनबी मगर कितना अजीब था....
मुझ में ही बोलता था...सो अब भूलता नही....
वोह कहकहे,वोह शोखियाँ, वोह बांकपन "हया"...
कहने को इक बला था........सो अब भूलता नही...
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment