है दुआ याद मगर हर्फ़-ए-दुआ याद नही
मेरे नगमात को अंदाज़-ए-नवा याद नही
हमने जिनके लिए राहों में बिछाया था लहू
हमसे कह्ते हैं वोही एहद-ए-वफ़ा याद नही
जिंदगी जबर-ए-मुसलसल की तरह काटी है
जाने किस जुर्म की पायी है सज़ा याद नही
मैंने पलकों से दर-ए-यार पे दस्तक दी है
मैं वोह सयाल हूँ जिसे कोई सदा याद नही
सिर्फ़ धुन्धलाये सितारों की ज़ियाँ देखी है
कब हुआ कौन हुआ मुझसे ख़फा याद नही
आओ इक सजदा करें आलम-ए-मदहोशी में
लोग कह्ते हैं के सागर को खुदा याद नही
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