यूँ एक पल मत सोच के अब क्या हो सकता है
एक लम्हे की ओट भी परदा हो सकता है
इन् आँखों के अन्दर भी दरकार हैं ऑंखें
चेहरे के पीछे भी चेहरा हो सकता है
कुछ रूहें भी चलती हैं बैसाखी ले कर
आधा शख्स भी पूरा क़द का हो सकता है
कंधे करीयल के हों और गठरी बुढिया की
बोझ उठा कर भी जी हल्का हो सकता है
मुझसे मिलकर भी वो मेरा हाल न पूछे
सावन भी क्या इतना सूखा हो सकता है
इतनी खामोशी भी अच्छी नहीं है लोगों
सन्नाटों से भी हंगामा हो सकता है
इस दुनिया में न_मुमकिन नहीं 'मुज़फ्फर'
दूध भी काला, शहद भी कड़वा हो सकता है
Friday, June 5, 2009
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