मेरे इश्क को निढाल कर
कभी हिज़र को भी विसाल कर
मेरी आँख को बिनाई दे
मेरे क़ल्ब में उलाल कर
मुझे दरस दे फ़ना का
मेरा इश्क में बुरा हाल कर
मुझे दे सज़ा कोई सख्त सी
मुझे इस जहाँ में मिसाल कर
मेरी असल सूरत बिगाड़ दे
किसी इश्क भट्टी में डाल कर
मुझे भी पिला कोई ऐसी शै
कभी मेरी ऑंखें भी लाल कर
तेरी तलब में हैं हम
दरबदर कभी इस तरफ भी ख्याल कर
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment