हर बात पे ताना, हर अंदाज़ में गुस्सा
क्यों साफ़ नहीं कह्ते, मुहब्बत नहीं रही
गैरों पे करम, अपनों पे सितम करते हो
फिर शान से कह्ते हो कुरबत नहीं रही
सेहरा में, तपिश में, जब तुमने हमें छोडा
इस हुसन के बाज़ार में, वो कीमत नहीं रही
माना के हमसे, भी बहुत गलतियाँ हुई
शायद के दरगुज़र ... कि तुम्हे आदत नहीं रही
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