डूबते शहर का मंज़र नज़र आता है मुझे
दूर तक एक समन्दर नज़र आता है मुझे
जाने किस का है जो पैकर नज़र आता है मुझे
एक इंसान मेरे अन्दर नज़र आता है मुझे
दिल की आंखों से ज़माने को अगर देखों मैं
वक्त के हाथ में पठार नज़र आता है मुझे
वोस’अत-ए-दीदा-ओ-दिल का कोई आलम तोह देखे
अब तोह हर क़तर समन्दर नज़र आता है मुझे
दूर रहना तोह कभी उस्सको गवारा ही नही !!
साया बन कर वोह सरासर नज़र आता है मुझे
उससके पैकर से जो ताबीर किया जाता था !
वो भी अब अपना ही पैकर नज़र आता है मुझे
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