छत्री लगा के घर से निकलने लगे हैं हम
अब कितनी एहतियात से चलने लगे हैं हम
इस दरजे होशियार तोह पहले कभी न थे
अब क्यूँ क़दम क़दम पे सँभालने लगे हैं हम
हो जाते हैं उदास के जब दोपहार के बाद
सूरज पुकारता है के ढलने लगे हैं हम
ऐसा नहीं के बर्फ की मानिंद हो मगर
लगता है यूँ के जैसे पिघलने लगे हैं हम
आईना देखने की ज़रूरत न थी कोई
ख़ुद जानते थे हम के बदलने लगे हैं हम
इसका यकीन आज भला किसको आएगा
एक धीमी धीमी आंच में जलने लगे हैं हम
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