Saturday, May 30, 2009

unknown

छत्री लगा के घर से निकलने लगे हैं हम
अब कितनी एहतियात से चलने लगे हैं हम
इस दरजे होशियार तोह पहले कभी न थे
अब क्यूँ क़दम क़दम पे सँभालने लगे हैं हम
हो जाते हैं उदास के जब दोपहार के बाद
सूरज पुकारता है के ढलने लगे हैं हम
ऐसा नहीं के बर्फ की मानिंद हो मगर
लगता है यूँ के जैसे पिघलने लगे हैं हम
आईना देखने की ज़रूरत न थी कोई
ख़ुद जानते थे हम के बदलने लगे हैं हम
इसका यकीन आज भला किसको आएगा
एक धीमी धीमी आंच में जलने लगे हैं हम

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