इक-इक पत्थर जोडके मैंने जो दीवार बनाईं है
झाँकू उसके पीछे तोह रुसवाई ही रुसवाई है
यु लगता है सोते जागते औरों का मोहताज हूँ मैं
आँखें मेरी अपनी है पर उन् में नींद परे है
देख रहे हैं सब हैरत से नीले-नीले पानी को
पूछे कौन समंदर से तुझ में कितनी गहराई है
सब कह्ते हैं इक जन्नत उतरी है मेरी धरती पर
मैं दिल में सोचूं शायद कमज़ोर मेरी बिनाई है
बहार सहन में पदों पर कुछ जलते बुझते जुगनू थे
हैरत है फिर घर के अन्दर किसने आग लगे है
आज हुआ मालुम मुझे इस शहर के चाँद सयानो से
अपनी राह बदलते रहना सबसे बड़ी दानाई है
तोड़ गए पैमान-ऐ-वाफ्फा इस दौर में कैसे कैसे लोग
ये मत सोच 'क़तील' की बस इक यार तेरा हरजाई है
Friday, May 29, 2009
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment