ये कह कर दिए मेरी किस्मत में नाले
तुम्हारी अमानत तुम्हारे हवाले
बस इतनी है दूरी ये मंजिल है ये मैं हूँ
कहाँ आके फूटे हैं पाऊँ के छले
करूँ ऐसा सजदा वो घबरा के कह दें
खुदा के लिए अब तोह सर को उठा ले
मरीज़-ए-शब्-ए-ग़म की साँस आखिरी है
चराग-ए-सहर ले रहा है संभाले
कभी मर भी चुका ऐ ! मरीज़-ए-मुहब्बत
परेशान बैठे हैं घर जाने वाले
क़यामत हैं ज़ालिम की नीची निगाहें
खुदा जाने क्या हो जो नज़रें उथले
'कमर' मैं हूँ मुख्तार तंजीम-ए-शब् का
हैं मेरे ही बस में अंधेरे उजाले
Saturday, May 30, 2009
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