Friday, May 29, 2009

muzaffar hanif ki shayyiri

सितम-रशीदा है हिंदुस्तान में उर्दू
इसी ज़ुबाँ में हिंदुस्तान ज़यादा है
उचल पड़ता है साया और मुझको डर नहीं लगता
कोई आसेब हो इंसान से बढ़ कर नहीं लगता
कहीं कच्चे फलों को संग-बारी तोड़ लेती है
कहीं फल सूख जाते हैं कोई पत्थर नहीं लगता
हजारों मुश्किलें हैं दोस्तों से दूर रहने में
मगर एक फायदा है पीठ पर खंजर नहीं लगता
कहा फिर फ़ोन पर मान से के रावी[narrator] ऐश लिखता है
समंदर पार मेरा हाल क्या है किसने देखा है
उजाले के नुमाइंदे नई तारीख लिखते हैं
जलाई हैं कुछ इतनी बस्तियां हर सू उजाला है
इतनी नोकेली किरणों से पौधा तोह जल जाएगा
लेकिन दस-बारह घंटों में सूरज भी ढल जाएगा

No comments:

Post a Comment