न हारा है इश्क और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है हवा चल रही है
सुकून ही सुकून है, खुशी ही खुशी है
तेरा ग़म सलामत मुझे क्या कमी है
वो मौजूद हैं और उनकी कमी है
मुहब्बत भी तन्हाई-ए-दाइमीं है
खटक गुदगुदी का मज़ा दे रही है
जिसे इश्क कह्ते हैं शायद यही है
चरागों के बदले मकान जल रहे हैं
नया है ज़माना, नई रौशनी है
ज़फाओं पे घुट घुट के चुप रहने वालो
खामोशी जफ्फओं की ताईद भी है
मेरे राहबर मुझको गम-राह कर दे
सुना है के मंजिल करीब आ गई है
'खुमार'-ऐ-बालानोश तू और तौबा
तुझे जाहिदों की नज़र लग गई है
Friday, May 29, 2009
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