मिसाल इसकी कहाँ है ज़माने में
की सारे खोने के ग़म पाये हमने पाने में
वो शक्ल पिघली तोह हर शै में ढल गई जैसे
अजीब बात हुई है उससे भुलाने में
जो मुन्तजिर न मिला, वो तोह हम हैं शर्मिंदा
की हमने देर लगा दी पलट के आने में
लतीफ़ था वो तखैयुल से, ख्वाब से नाज़ुक
गवा दिया हमने ही उसे आजमाने में
समझ लिया था कभी एक सराब को दरिया
पर एक सुकून था हमको फरेब खाने में
झुका दरख्त हवा से, तोह आंधियों ने कहा
ज़्यादा फर्क नहीं झुक के टूट जाने में
Friday, May 29, 2009
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