Friday, May 22, 2009

jaun elia ki shayyiri

एक ही मुज्ह्दः[glad tiding] सुबह लाती है
सहन में धूप फैल जाती है
कया सितम है कि अब तेरी सूरत
गौर करने पे याद आती है
सोचता हूँ कि उसकी याद आखिर
अब किसे रात भर जगाती है
उस वफ़ा-आशना[who know fidelity] कि फुरक़त में
ख्वाहिश-ए-गैर क्यूँ सताती है
कौन इस घर कि देख-भाल करे
रोज़ एक चीज़ टूट जाती है

No comments:

Post a Comment