दोनों जहाँ तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब्-ऐ-ग़म गुज़र के
वीराँ है मयकदा, खुम-ओ-सागर उदास है
तुम क्या गये की रूठ गए दिन बहार के
इक फुर्सत-ए-गुनाह मिली, वो भी चार दिन
देखे हैं हमने हौसले परवर-दीगर के
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझसे भी दिल फरेब हैं ग़म रोज़गार के
भूले से मुसकुरा तोह दिए थे वो आज 'फैज़'
मत पूछ वलवाले दिल-ऐ-नकरदाकार के
Friday, May 29, 2009
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