ख्वाब नगर है ऑंखें खोले देख रहा हूँ
उसको अपनी जानीब आते देख रहा हूँ
किस की आह्ट करया करया[village/town] फैल रही है
दीवारों के रंग बदलते देख रहा हूँ
कौन मेरे जादू से बच कर जा सकता है
आईना हूँ, सब के चेहरे देख रहा हूँ
दरवाज़े पर तेज़ हवाओं का पहरा है
घर के अन्दर चुप पे साए देख रहा हूँ
जैसे मेरा चेहरा मेरे दुश्मन का हो
आईने में ख़ुद को ऐसे देख रहा हूँ
मंज़र मंज़र वीरानी ने जाल ताने हैं
गुलशन गुलशन बिखरे पत्ते देख रहा हूँ
मंजिल मंजिल होल में डूबी आवाजें हैं
रास्ता रास्ता खौफ्फ़ के पहरे देख रहा हूँ
शहर संगदलाल में 'अमजद' हर पस्ते पर
आवाजों के पत्थर चलते देख रहा हूँ
Friday, May 29, 2009
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