मेहरो-वफ़ा में दिखावट बहुत है
खाव मजबूत है बुनावट बहुत है
रोज़-ए-ज़ज़ा आना है एक दिन
जहाँ में फिर भी सजावट बहुत है
बाज़ न आ रहा है सितम-जरीफ
उसे मालूम मुझे थकावट बहुत है
Thursday, April 16, 2009
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urdu ghazals, shayari.
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