घाटों की उदासी पी रहा हूँ
मैं एक गहरा समंदर बन गया हूँ
तेरी यादों के अंगारों को अक्सर
तसव्वुर के लबों को चूमता हूँ
कोई पहचानने वाला नहीं है
भरे बाज़ार में तन्हा खड़ा हूँ
मेरा क़द कितना ऊंचा हो गया है
फलक की वुस'अतों[expansion] को नापता हूँ
वो यूँ मुझको भुलाना चाहते हैं
के जैसे मैं भी कोई हादिसा हूँ
बदलते मौश्मों की डाईरी से
तेरे बारे में अक्सर पूछता हूँ
किसी की याद के पत्तों को 'आज़ेर'
हवाओं से बच्चा कर रख रहा हूँ
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Friday, May 29, 2009
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