इश्क के जितने भी अंजाम यहाँ मुमकिन थे
हो चुके दिल पे जो आल्हम यहाँ मुमकिन थे
खुल गए दिल पे मेरे इश्क के अंदेशों में
जितने आगाज़ के अंजाम यहाँ मुमकिन थे
दिल तेरा पर न मिला गरचे सभी कर देखे
बाब में इश्क के जो काम यहाँ मुमकिन थे
आओ वीराना-ए-हस्ती को मुनव्वर कर लें
कब भला ऐसे सुबह-ए-शाम यहाँ मुमकिन थे
छोड़ना न था दर-ए-यार को हरगिज़ तुझको
मिलने उस शोख के पैगाम यहाँ मुमकिन थे
हुस्न तेरा जो यहाँ आम कभी हो जाता
होने दस्तूर-ए-वफ़ा आम यहाँ मुमकिन थे
हो के आलम ही यहाँ दिल में मेरे चारों तरफ़
मिट गए मिटने जो अब्हाम यहाँ मुमकिन थे
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