Monday, June 1, 2009

unknown

कहो दुःख के समन्दर का सफर अब तक रहा कैसा
कहाँ उजाले किनारों का कोई इमकान देखा है
कहो दरिया किनारों से भला क्या गुफ्तगू ठहरी
कहाँ दरिया को अपने ज़ब्त पे हैरत देखना है
कहाँ क्यूँ किस लिए खोला ये तुमने दिल का दरवाज़ा
बताया दिल के रास्तों पर कोई मेहमान देखा है
कहो उस इश्क की बाबत, भला क्या हद रही होगी
कहाँ वोह इश्क जैसे रुह का सरतान देखा है
कहो उससे बिछड़ने की, तुम्हें मंज़ूर यह होगा
कहाँ जीने की ख्वाहिश को कभी कुर्बान देखा है
कहो फिर तुम पे क्या गुजरी वोह ख्वाब--जिंदगी खो कर
कहाँ कल अपनी आँखों को बोहत बे-जान देखा है

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