पर जो जल जाए तो परवाज़ पे हर्फ़ आता है
अपने जीने के हर हर अंदाज़ पे हर्फ़ आता है
चीखते रहना मोअस्सिर नहीं होता अक्सर
हलक जो खुश्क हो तो आवाज़ पे हर्फ़ आता है
फण है शर्मिंदा बोहत लर्जिश-ए-आसाब के साथ
कभी नगमा पे कभी साज़ पे हर्फ़ आता है
जिसके बाजू में रही कुव्वत-ए-यलगार नहीं
उसकी तो फितरत-ए-शाहबाज़ पे हर्फ़ आता है
अपने काबू में ज़ुबाँ जब नहीं रहती 'मैकश'
दिल में पोशीदा हर एक राज़ पे हर्फ़ आता है
Saturday, June 6, 2009
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