पी कर भी तबियत में तल्खी है गिरानी है
इस दौर के शीशों में सेहबा है की पानी है
इस शहर के कातिल को देखा तो नहीं लेकिन
मकतल से झलकता है कातिल की जवानी है
जलता था जो घर मेरा कुछ लोग ये कह्ते थे
क्या आग सुनहरी है क्या आग सुहानी है
इस फ़न की लताफ़त को ले जाऊं कहाँ आख़िर
पत्थर का ज़माना है शीशे की जवानी है
क्या तुमसे कहें क्या है आहंग 'शमीम' अपना
शोलों की कहानी है शबनम की जवानी है
Thursday, June 4, 2009
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