समंदर को अपना राजदान समझा था मैं
मुक़द्दर को अपने मेहरबान समझा था मैं
चाँद हाथो में होगा सितारे क़दमों में
बस यही मोहब्बत का अंजाम समझा था मैं
मोहब्बत में फतह कर जाऊंगा इस जहाँ को भी
आह ! ज़माने को कितना नादान समझा था मैं
वो कह्ते हैं, न अब कोई रिश्ता रख मुझसे
जिन्की आशनाई को न-तमाम समझा था मैं
कैसे भूल जाऊं उस निगाह-ए-नाज़ को
जिसकी बे_अदबी को भी सलाम समझा था मैं
उसी ने किया है भरी बज्म में रुसवा मुझे
जिसको अपनी हकीक़त का निगहबान समझा था मैं
तू न रौंद मेरी उल्फत के फूलों को 'राशिद'
तुझको तो इस गुलिस्तान का बागबान समझा था मैं..
Subscribe to:
Post Comments (Atom)


No comments:
Post a Comment