Friday, June 5, 2009

rashid ki shayyiri

समंदर को अपना राजदान समझा था मैं
मुक़द्दर को अपने मेहरबान समझा था मैं
चाँद हाथो में होगा सितारे क़दमों में
बस यही मोहब्बत का अंजाम समझा था मैं
मोहब्बत में फतह कर जाऊंगा इस जहाँ को भी
आह ! ज़माने को कितना नादान समझा था मैं
वो कह्ते हैं, न अब कोई रिश्ता रख मुझसे
जिन्की आशनाई को न-तमाम समझा था मैं
कैसे भूल जाऊं उस निगाह-ए-नाज़ को
जिसकी बे_अदबी को भी सलाम समझा था मैं
उसी ने किया है भरी बज्म में रुसवा मुझे
जिसको अपनी हकीक़त का निगहबान समझा था मैं
तू न रौंद मेरी उल्फत के फूलों को 'राशिद'
तुझको तो इस गुलिस्तान का बागबान समझा था मैं..

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