इस अदा से भी हूँ मैं आशना
तुझे इतना जिस पे गुरूर है
मैं जीयुंगा तेरे बगैर भी
मुझे जिंदगी का शाउर है
जो समझ लिए तुझे बेवफा
तू फिर इस में तेरी भी क्या खता
ये खलल है मेरे दिमाग का
यह मेरी नज़र का कसूर है
मैं निकल के भी तेरे दाम से
न गिरूँगा अपने मकाम से
मैं 'क़तील' जो रु-ए-सितम सही
मुझे तुमसे इश्क ज़रूर है
Saturday, June 6, 2009
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