दिल में और तो क्या रखा है
तेरा दर्द छुपा रखा है
इतने दुखों की तेज़ हवा में
दिल का दीप जला रखा है
इस नगरी के कुछ लोगों ने
दुःख का नाम दावा रखा है
वादा-ए-यार की बात न छेडो
ये धोखा भी खा रखा है
भूल भी जाओ बीती बातें
इन् बातों में क्या रखा है
चुप चुप क्यूँ रहते हो 'नासिर'
यह क्या रोग लगा रखा है
Tuesday, June 2, 2009
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