कल चौदहवीं की रात थी शब् भर रहा चर्चा तेरा
कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा
हम भी वहीं मौजूद थे हमसे भी सब पूछा किए
हम हँस दिए हम चुप रहे मंजूर था परदा तेरा
इस शहर में किस से मिलें हमसे तो छूटी महफिलें
हर शख्स तेरा नाम ले हर शख्स दीवाना तेरा
कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएँ मगर
जंगल तेरे परबत तेरे बस्ती तेरी सेहरा तेरा
हम और रस्म-ए-बंदगी आशुफ़्तगी उफ्तादगी
एहसान है क्या क्या तेरा ऐ हुस्न-ए-बेपरवाह तेरा
दो अश्क जाने किस लिए पलकों पे आ कर टिक गए
अल्ताफ की बारिश तेरी इकराम का दरिया तेरा
ऐ बेदरेग-ओ-बे_अमां हमने कभी की है फुगाँ[complaint]
हमको तेरी वेह्शत सही हमको सही सौदा तेरा
हम पर ये सख्ती की नज़र हम हैं फकीर-ए-राहगुज़र
रास्ता कभी रोका तेरा दमन कभी थमा तेरा
हाँ हाँ तेरी सूरत हसीन लेकिन तू ऐसा भी नहीं
इस शख्स के अशआर से शोहारा हुआ क्या क्या तेरा
बेशक उसकी का दोष है कहता नहीं खामोश है
तू अब कर ऐसी दावा बीमार हो अच्छा तेरा
बेदर्द सुनी है तो चल कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल
आशिक तेरा रुसवा तेरा शायर तेरा 'इंशा' तेरा
Tuesday, June 2, 2009
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