'फ़रज़' अब कोई सौदा कोई जूनून भी नही
मगर करार से दिन कट रहे हो यूँ भी नही
लब-ओ-दहन भी मिला गुफ्तगू का फ़न भी मिला
मगर जो दिल पे गुज़रती है कह सकूं भी नही
मेरी जुबां की लुकनत से बद-गुमां न हो
जो तू कहे तो तुझे उमर भर मिलूं भी नही
'फ़रज़' जैसे कोई दिया तुर्बत-ए-हवा चाहे है
तू पास आए तो मुमकिन है मैं रहूँ भी नही
Saturday, June 6, 2009
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