ख़ुद को पढता हूँ, छोड़ देता हूँ
एक वर्क रोज मोड़ देता हूँ
इस कदर ज़ख्म हैं निगाहों में
रोज एक आईना तोड़ देता हूँ
मैं पुजारी बरसते फूलों का
छू के शाखों को छोड़ देता हूँ
कासा-ए-शब्(begging bowl of nite) में खून सूरज का
कतरा कतरा निचोड़ देता हूँ
कांपते होंट भीगती पलकें
बात अधूरी ही छोड़ देता हूँ
रेत के घर बना बना के "फ़रज़"
जाने क्यूँ ख़ुद ही तोड़ देता हूँ
Friday, June 5, 2009
Subscribe to:
Post Comments (Atom)


No comments:
Post a Comment