दोस्ती में शामिल बुग्ज़ का उनसार भी था
फूल थे हाथों में ज़र-ए-आस्तें खंजर भी था
आज मजबूरी ने मेरी रख दिया है काट कर
वरना इन् खुद्दार शानों पर मेरे एक सर भी था
खूगर-ए-सेहरा नवर्दी हो गया हूँ इस कदर
भूल बैठा हूँ किसी बस्ती में मेरा घर भी था
कौन बढ़ता फिर भला मेरी मदद के वास्ते
मेरा दुश्मन साहिब-ए-जार और ताक़तवर भी था
फूँक डाले जिस ने कितने ही गरीबों के माकन
आग के शोलों की ज़द पर आज उसका घर भी था
हौसला अफजाई में मेरी रहा जो पेश पेश
राह का मेरी वोही सबसे बड़ा पत्थर भी था
मैं ही तन्हा तो नहीं था इश्क में रुसवा 'सबा'
एक छोटा ही सही इल्जाम उसके सर भी था
Saturday, June 6, 2009
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