दिल शिकस्ता हूँ कोई गीत सुनाऊं कैसे ?
मीर-ओ-महफिल ही नही बज्म सजाऊं कैसे ?
अपनी पहचान तो हालात में खो बैठा हूँ
बे-निशान हो के तेरे सामने आऊं कैसे ?
बहते पानी की तरह मुझको रवां रहना है
अपनी फितरत के तकाजों को भुलाऊं कैसे ?
मुझको सोचों की असीरी से रिहाई न मिली
तेरी आवाज़ में आवाज़ को मिलाऊं कैसे ?
कब से जारी है मेरी रूह में किरनों का सफर
बात दिल की तेरे अदराक में लाऊँ कैसे ?
मैं तो ख़ुद तीरगी-ए-शब् का मुसाफिर हूँ
कोई शमा तेरी राहों में जलाओं कैसे ?
दिल के वीराने में क्यूँ मुझको सदा देते हो
मैं गया वक्त हूँ अब लौट के आऊं कैसे ?
घर के जलने का सबब पूछ रहे हो 'असीम'
शब् उजालों की शरूअत बताओं कैसे ?
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