दिन चढ़े और बिखर जाऊं
रात उतरे तो मैं घर जाऊं
बोहत एहसास है होने का
इतना जिंदा हूँ के मर जाऊं
मैं ज़मीन-दादः[inhabiting land] सही फिर भी
आसमां सा हूँ जिधर जाऊं
वाही बेचेहरगी हर सू है
आईना हूँ मैं, किधर जाऊं
Thursday, June 4, 2009
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